नई दिल्ली
देश के सबसे बड़े धरना स्थल, दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक अनोखी और रचनात्मक पहल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि प्रदर्शनकारियों के लिए एक छोटी ‘लाइब्रेरी’ (पुस्तकालय) स्थापित कर रहे दो छात्रों के साथ पुलिस ने कथित तौर पर मारपीट की है। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं।अभिजीत दिपके ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर कुछ तस्वीरें और वीडियो पोस्ट किए हैं। इन विजुअल्स में दो छात्रों के शरीर पर चोट के निशान और नील दिखाई दे रहे हैं।
- ये छात्र जंतर-मंतर पर आने वाले आंदोलनकारियों और आम लोगों के लिए किताबों का एक छोटा संग्रह (ओपन-एयर लाइब्रेरी) तैयार कर रहे थे।
- इस पहल का मकसद धरना स्थल पर आने वाले लोगों के बीच शांतिपूर्ण माहौल में संवाद, पढ़ने की संस्कृति और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना था।
- दिपके का आरोप है कि जब छात्र किताबों को व्यवस्थित कर रहे थे, तभी दिल्ली पुलिस के जवान वहां पहुंचे, उन्हें जबरन हटाने की कोशिश की और इस दौरान उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई।
सोशल मीडिया पर भड़का गुस्सा, उठे लोकतांत्रिक अधिकार पर सवाल
वीडियो और तस्वीरें वायरल होने के बाद इंटरनेट पर यूजर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। लोगों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण और रचनात्मक (Creative) तरीके से अपनी बात रखने या किताबें बांटने जैसी पहल पर इस तरह का बल प्रयोग पूरी तरह गलत है।
दिल्ली पुलिस का रुख: आधिकारिक बयान का इंतजार
चूंकि जंतर-मंतर एक बेहद संवेदनशील इलाका है और संसद भवन के बेहद करीब है, इसलिए वहां सुरक्षा व्यवस्था काफी सख्त रहती है। हालांकि, समाचार लिखे जाने तक इस पूरे घटनाक्रम और मारपीट के आरोपों पर दिल्ली पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
विशेषज्ञों और निष्पक्ष विश्लेषकों का कहना है कि ग्राउंड जीरो पर वास्तविक स्थिति क्या थी, छात्रों को हटाने के पीछे की कानूनी वजह क्या थी, या क्या उनके पास आवश्यक अनुमति थी—इन सभी सवालों के जवाब पुलिस का पक्ष सामने आने के बाद ही साफ हो सकेंगे।
विमर्श: विरोध का अधिकार बनाम सार्वजनिक व्यवस्था
फिलहाल यह मामला गंभीर आरोपों के घेरे में है। वायरल वीडियो और तस्वीरों की अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर देश में नागरिकों के विरोध करने के अधिकार, सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल की सीमा और पुलिस की भूमिका को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
अब सबकी नजरें दिल्ली पुलिस के बयान और इस मामले की निष्पक्ष जांच पर टिकी हैं कि क्या सच में एक ‘लाइब्रेरी’ को रोकने के लिए लाठियां चलीं या कहानी के पीछे कोई और प्रशासनिक वजह थी।
