मुंबई। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति से जुड़ी याचिका खारिज किए जाने के फैसले पर AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कड़ी असहमति जताई है। उन्होंने अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान में दिए गए अधिकारों से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।
वारिस पठान ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद और धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 और 29 का उल्लेख करते हुए दावा किया कि धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करना जरूरी है।
‘फ्रीडम ऑफ चॉइस’ का दिया हवाला
वारिस पठान ने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार धार्मिक पहचान से जुड़े प्रतीक पहनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह हिंदू महिलाओं के मंगलसूत्र और सिंदूर को लेकर सामान्य तौर पर सवाल नहीं उठाए जाते और सिख समुदाय के लोगों के पगड़ी पहनने पर भी आपत्ति नहीं की जाती, उसी तरह मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने को लेकर भी भेदभाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी छात्रा को केवल हिजाब पहनने के कारण शिक्षा से जुड़ी गतिविधियों में परेशानी नहीं होनी चाहिए और ‘फ्रीडम ऑफ चॉइस’ के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर उठाए सवाल
AIMIM नेता ने हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी असहमति जाहिर करते हुए कहा कि धार्मिक आस्था से जुड़े पहनावे को लेकर सभी समुदायों के लिए समान दृष्टिकोण होना चाहिए। उन्होंने इसे संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में देखने की बात कही।
वारिस पठान के बयान के बाद हिजाब और शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक प्रतीकों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो सकती है। यह मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत पसंद और शिक्षा संस्थानों के नियमों के बीच संतुलन को लेकर लगातार चर्चा में रहा है।
