रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नवा रायपुर स्थित ग्राम नकटी में शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर पूरे प्रदेश में चर्चा तेज हो गई है। बुलडोजर कार्रवाई के दौरान बेघर होते परिवारों की तस्वीरों ने लोगों को भावुक किया, वहीं प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई और संबंधित लोगों को लगभग दो वर्षों तक लगातार नोटिस देकर भूमि खाली करने का पर्याप्त अवसर दिया गया था।
प्रशासन के अनुसार जिन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई, उन्होंने वर्षों से शासकीय भूमि पर कब्जा कर रखा था। कई मामलों में कब्जा छोटे भूखंडों तक सीमित नहीं था, बल्कि हजारों से लेकर लगभग 30 हजार वर्गफुट तक सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया गया था। प्रशासन की सूची के अनुसार देवकुमार रात्रे ने 29,700 वर्गफुट, जानकी साहू ने 29,600 वर्गफुट, मुकेश पाल ने 19,800 वर्गफुट, मायाराम यादव ने 18,500 वर्गफुट, दूरपति रात्रे ने 18,300 वर्गफुट तथा मनोज साहू ने 17,200 वर्गफुट भूमि पर कब्जा किया हुआ था। इसके अलावा कई अन्य लोगों के नाम भी सूची में शामिल हैं, जिनके कब्जे का क्षेत्रफल 800 से लेकर 15 हजार वर्गफुट से अधिक तक बताया गया है।
स्थानीय स्तर पर इस भूमि का बाजार मूल्य लगभग ₹5,000 प्रति वर्गफुट बताया जा रहा है। इस आधार पर केवल 29,700 वर्गफुट भूमि की अनुमानित कीमत करीब ₹14.85 करोड़ बैठती है। प्रशासन का दावा है कि इस तरह करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन वर्षों तक निजी उपयोग में रही।
जानकारी के अनुसार यह भूमि सामान्य आवासीय कॉलोनी की नहीं, बल्कि शासकीय भाटा एवं चरागाह (गौचर) भूमि है, जिसका उपयोग नियमानुसार स्कूल, अस्पताल, गौशाला और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण के लिए किया जाना है। भविष्य में इस भूमि का उपयोग किस उद्देश्य से होगा, यह सरकार का नीतिगत विषय है। हालांकि यदि इस भूमि पर विधायकों के आवास बनाने का प्रस्ताव है तो उस पर अलग राजनीतिक बहस हो सकती है, लेकिन इससे सरकारी भूमि पर हुए अतिक्रमण को वैध नहीं माना जा सकता।
प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था की गई है। अधिकारियों के अनुसार जिन परिवारों पर कार्रवाई हुई है, उन्हें नवा रायपुर के सेक्टर-30 में आवास उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इन फ्लैटों का सामान्य बाजार मूल्य लगभग ₹8 लाख बताया जाता है और पात्र परिवारों को मालिकाना अधिकार देने की प्रक्रिया भी जारी है। जिन लाभार्थियों के प्रधानमंत्री आवास प्रभावित हुए हैं, उनके लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है।
हालांकि इस कार्रवाई ने कई महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े किए हैं। एक ओर प्रशासन का कहना है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा हटाना कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक था, वहीं दूसरी ओर विस्थापित परिवारों के रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और पशुधन की व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
इस पूरे मामले ने न्याय और समानता को लेकर भी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में कानून का समान रूप से पालन कराना चाहती है, तो कार्रवाई केवल गरीबों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जहां कहीं भी प्रभावशाली लोगों, नेताओं, व्यापारियों या अन्य आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्तियों द्वारा सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है, वहां भी समान कठोरता से कार्रवाई होनी चाहिए। कानून की नजर में अवैध कब्जा करने वाला व्यक्ति गरीब हो या अमीर, सभी के लिए नियम एक जैसे होने चाहिए।
नकटी गांव की यह घटना केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भर नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, पुनर्वास की जिम्मेदारी और कानून के समान अनुपालन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी व्यापक बहस का विषय बन गई है। प्रशासन का कहना है कि संवेदनशीलता के साथ पुनर्वास की जिम्मेदारी निभाई जाएगी, लेकिन सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे को किसी भी परिस्थिति में वैध नहीं माना जा सकता।
