वाशिंगटन/तेहरान: पिछले करीब तीन महीनों से चल रहे अमेरिका और ईरान के बीच के सैन्य तनाव को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने घोषणा की है कि दोनों देशों के बीच युद्ध अब खत्म हो चुका है और इसी वीकेंड (शनिवार-रविवार) को एक बेहद मजबूत ‘समझौता ज्ञापन’ (MoU) पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।
ट्रंप ने यह भी साफ किया है कि इस ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लगाने के लिए वह खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) को भेजने की योजना बना रहे हैं।
66 दिनों में 39वां दावा: क्या वाकई होगा समझौता?
भले ही राष्ट्रपति ट्रंप इस डील को लेकर बेहद आश्वस्त दिख रहे हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ उनके इस दावे को संशय की नजर से देख रहे हैं। अमेरिकी मीडिया नेटवर्क CNN के एक विश्लेषण के मुताबिक, पिछले 66 दिनों में ट्रंप कम से कम 39 बार सार्वजनिक रूप से यह दावा कर चुके हैं कि ईरान के साथ डील बस होने ही वाली है। ऐसे में दुनिया के लिए इस बार भी उनकी बात पर पूरी तरह भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है।
ईरान ने किया दावों का खंडन
ट्रंप के इस बड़े बयान के तुरंत बाद ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सरकारी टेलीविजन पर आकर स्थिति स्पष्ट की। ईरान का कहना है कि दोनों देशों के बीच बातचीत तो जरूर चल रही है, लेकिन संघर्ष खत्म करने को लेकर अभी तक कोई भी अंतिम समझौता (Final Deal) नहीं हुआ है।
एक्सपर्ट व्यू: आखिर ट्रंप ने क्यों बदले अपने सुर?
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के वाइस प्रेसिडेंट और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हर्ष पंत ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहराई से रोशनी डाली है। उनके विश्लेषण के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- सहयोगी देशों का भारी दबाव: राष्ट्रपति ट्रंप लगातार तीसरे दिन ईरान पर बड़े हमले का एलान करने के बाद अचानक पीछे हट गए हैं। माना जा रहा है कि बहरीन, कतर, यूएई और सऊदी अरब जैसे खाड़ी के सहयोगी देशों ने अमेरिका पर भारी दबाव बनाया है। अगर ईरान पर बड़ा हमला होता, तो ईरानी सेना इन क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाती, जिससे पूरा मिडिल ईस्ट सुलग जाता।
- घरेलू मोर्चे पर घिरे ट्रंप: इस युद्ध की वजह से वैश्विक तेल बाजार पूरी तरह हिल चुका है, जिससे आम जनता परेशान है। अमेरिका में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है, जिसके चलते उन्हें पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।
- ईरान का ‘अपर हैंड’: फिलहाल इस बातचीत में ईरान खुद को मजबूत स्थिति में देख रहा है और वह अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है।
आगे क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मोड़ पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोई पक्की डील हो ही जाएगी। अगर दोनों देशों के बीच किसी तरह के समझौते का एलान हो भी जाता है, तो असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या यह डील लंबे समय तक टिक पाएगी? फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस वीकेंड पर टिकी हैं कि क्या वाशिंगटन और तेहरान के बीच ‘इस्लामाबाद समझौते’ पर अंतिम मुहर लगती है या यह केवल ट्रंप का एक और राजनीतिक दावा बनकर रह जाता है।
