रायपुर। से इस वक्त की सबसे बड़ी और सबसे शर्मनाक खबर ने पूरे छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे और राज्य सरकार की कानून व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। राजधानी में 25 करोड़ रुपये की कथित रंगदारी के हाई-प्रोफाइल मामले में मुख्य आरोपी शोएब ढेबर पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया और इस फरारी के पीछे कोई बाहरी आदमी नहीं, बल्कि विभाग के अपने ही दो सिपाही निकले हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं – क्योंकि उन्हें वर्दी के अंदर से ही संरक्षण मिल रहा है।
क्या है पूरा 25 करोड़ की रंगदारी का मामला?
यह मामला कोई छोटा-मोटा नहीं है। कांग्रेस नेता और कारोबारी आनंद कुकरेजा से 25 करोड़ रुपये की रंगदारी मांगने का आरोप शोएब ढेबर पर है। यह वही शोएब ढेबर है जिसका नाम पहले भी कई विवादित मामलों में आ चुका है और जो शहर में अपना एक अलग रसूख रखता है। पीड़ित की शिकायत पर रायपुर पुलिस ने मामला दर्ज किया था और उसे गिरफ्तार करने की तैयारी चल रही थी। यह केस सीधे तौर पर राजधानी की कानून व्यवस्था से जुड़ा था, इसलिए क्राइम ब्रांच को इसकी जिम्मेदारी दी गई थी।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, बुधवार को पुलिस को पक्की सूचना मिली थी कि शोएब अपने पाम बेलाजिओ स्थित लग्जरी फ्लैट में मौजूद है। इसके बाद एक गोपनीय प्लान बनाया गया। प्लान के मुताबिक, एक साथ 6 टीमों ने आधा दर्जन से ज्यादा ठिकानों पर एक साथ दबिश देने का फैसला किया। इसमें पाम बेलाजिओ का फ्लैट, बैरन बाजार स्थित उसका पैतृक आवास, तेलीबांधा और शंकर नगर के दो अन्य ठिकाने शामिल थे। उद्देश्य था कि आरोपी किसी भी तरफ से भाग न सके।

लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि जब क्राइम ब्रांच की टीमें इन ठिकानों पर पहुंची तो उन्हें हर जगह ताला लगा मिला या फिर वहां मौजूद लोगों ने बताया कि शोएब 15 से 20 मिनट पहले ही वहां से निकल गया है। पाम बेलाजिओ में तो उसके फ्लैट में चाय का कप तक गर्म मिला, जिससे साफ था कि वह अभी-अभी निकला है। साफ है कि किसी ने पुलिस की इस 100% गोपनीय रेड की सूचना पहले ही लीक कर दी थी। यह लीक कोई सामान्य लीक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी।
पुलिस का ‘काला चेहरा’ बेनकाब: कौन हैं वो 2 आरक्षक?
इस लापरवाही और मिलीभगत की जब अंदरूनी जांच शुरू हुई तो एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट में तैनात दो आरक्षकों का नाम सामने आया, जिन्होंने पूरे ऑपरेशन को फेल कर दिया।
पहला नाम है आरक्षक शिवम द्विवेदी का। शिवम द्विवेदी पिछले 3 सालों से क्राइम ब्रांच में ही तैनात है और उसे इस रेड की पूरी जानकारी थी। जांच में पता चला है कि रेड से ठीक एक घंटे पहले उसके नंबर से एक संदिग्ध नंबर पर लंबी बातचीत हुई है, जो शोएब के करीबी का बताया जा रहा है।
दूसरा नाम है आरक्षक राहुल सिंह गौतम का। राहुल भी उसी यूनिट में है और वह वायरलेस सेट पर होने वाली बातचीत को सुन रहा था। आरोप है कि उसने व्हाट्सएप के जरिए लोकेशन और टाइमिंग की जानकारी बाहर भेजी।
विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि इन दोनों ने ही रेड की गोपनीय जानकारी लीक की है। डीसीपी क्राइम ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दोनों को लाइन अटैच कर दिया है और उन्हें पुलिस लाइन में रिपोर्ट करने को कहा गया है। पुलिस इसे भले ही ‘प्रशासनिक कार्रवाई’ बता रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ लाइन अटैच करने से इतने बड़े अपराध पर पर्दा डल जाएगा? लाइन अटैच तो एक तरह का ट्रांसफर है, सजा नहीं। क्या 25 करोड़ के आरोपी को भगाने की सजा सिर्फ लाइन अटैच है?
क्या ये सिर्फ दो सिपाही हैं या बड़े चेहरे भी शामिल हैं?
यही सबसे बड़ा सवाल है। क्या ये दोनों छोटे सिपाही इतने बड़े आरोपी को बचाने की हिम्मत खुद से कर सकते हैं? क्या बिना किसी बड़े अधिकारी की शह के कोई आरक्षक इतनी बड़ी रेड की जानकारी लीक करने की जुर्रत कर सकता है? सूत्रों का कहना है कि इस खेल में टीआई स्तर के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध है, जिसकी विभागीय जांच चल रही है। बताया जा रहा है कि जिस समय रेड की प्लानिंग मीटिंग चल रही थी, उस मीटिंग में 2 टीआई रैंक के अधिकारी भी मौजूद थे। अब उन दोनों की कॉल डिटेल और लोकेशन भी खंगाली जा रही है।
जनता पूछ रही है कि क्या इन दो आरक्षकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है ताकि बड़े मगरमच्छों को बचाया जा सके? अगर टीआई स्तर के अधिकारी शामिल हैं तो उनके नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?
गृह मंत्री विजय शर्मा से 10 तीखे सवाल, जिनका जवाब देना होगा
राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा जो हर मंच पर कानून व्यवस्था पर बड़े-बड़े दावे करते हैं, छत्तीसगढ़ में सुशासन की बात करते हैं, अब इस मामले पर उनकी चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
- गृह मंत्री जी, जब आपकी पुलिस ही आरोपियों की मुखबिर बन जाएगी तो आम जनता किस पर भरोसा करेगी?
- 25 करोड़ की रंगदारी जैसा संगीन मामला और आरोपी आपकी नाक के नीचे से पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया, क्या यह आपके पुलिस तंत्र की पूरी तरह से नाकामी नहीं है?
- सिर्फ दो आरक्षकों को लाइन अटैच करना क्या एक खानापूर्ति और लीपापोती नहीं है? असली सरगनाओं पर बुलडोजर कब चलेगा?
- अगर टीआई स्तर के अधिकारियों की संलिप्तता की जांच चल रही है तो उनके नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे? क्या उन्हें बचाया जा रहा है?
- रायपुर जैसे राजधानी शहर में अगर आरोपी के हौसले इतने बुलंद हैं कि वह पुलिस की नाक के नीचे से फरार हो जाता है, तो बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ इलाकों की कानून व्यवस्था का क्या हाल होगा?
- शोएब ढेबर जैसे आरोपी के पुलिस के साथ इतने गहरे संबंध कैसे बन गए? क्या यह रिश्ता आज का है या सालों पुराना है?
- आपने कहा था कि पुलिस में गद्दारों के लिए कोई जगह नहीं है, तो फिर इन दो आरक्षकों को बर्खास्त क्यों नहीं किया गया, सिर्फ लाइन अटैच क्यों?
- क्या इस मामले में पीड़ित आनंद कुकरेजा को न्याय मिल पाएगा, जब आरोपी को खुद पुलिस भगा रही है?
- क्या आप इस पूरे मामले की जांच CBI या किसी स्वतंत्र एजेंसी से करवाएंगे, क्योंकि जांच पुलिस खुद कर रही है और आरोपी पुलिस वाले ही हैं?
- प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि शोएब ढेबर अब कहां है और उसे कब तक गिरफ्तार किया जाएगा?
अब देखना होगा कि पुलिस शोएब ढेबर को दोबारा कब तक गिरफ्तार कर पाती है और गृह मंत्री इस पूरे पुलिस-आरोपी गठजोड़ पर क्या जवाब देते हैं। क्या इस मामले में सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों की बलि देकर बड़े अधिकारियों को बचा लिया जाएगा? या फिर विजय शर्मा सरकार कोई बड़ी और निष्पक्ष कार्रवाई करके यह साबित करेगी कि छत्तीसगढ़ में कानून से बड़ा कोई नहीं है। फिलहाल तो रायपुर पुलिस की इस कार्रवाई ने खुद पुलिस की ईमानदारी पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।
