रायपुर.
क्षत्रिय करणी सेना की ओर से वीरेन्द्र सिंह तोमर ने सभी सनातनियों को गुरु पूर्णिमा की बधाई दी है. उन्होंने कहा है कि बिना गुरु के जीवन का उद्धार नहीं है.
ज्ञात हो कि भाई तोमर के मजबूत कँधों पर क्षत्रिय करणी सेना की जिम्मेदारी है. वह क्षत्रिय करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सँभाल रहे हैं
क्यूँ मनाई जाती है..?
करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष तोमर ने गुरु पूर्णिमा के इतिहास पर भी रौशनी डाली है. उनके मुताबिक एक दो साल नहीं बल्कि सालों साल पुराना यह पर्व है. इसे वह महाभारत काल से जोड़ते है.
भाई तोमर बताते हैं कि इस दिन को व्यास पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है. यह वह दिन था जब महाभारत के रचयिता व्यास का जन्म ऋषि पराशर और एक मछुआरे की पुत्री सत्यवती के घर हुआ था.
सनातनियों में प्रचलित मान्यता मुताबिक जानकारी देते हुए वह कहते हैं कि मुनि वेद व्यास ने अपने समय में प्रचलित सभी वैदिक भजनों को एकत्र किया था. उन्हें उनकी विशेषताओं और अनुष्ठानों में उपयोग के आधार पर चार भागों में विभाजित करके वैदिक अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.
आगे सेना के प्रदेश अध्यक्ष तोमर बताते हैं कि वेद व्यास जी ने ही अपने चार प्रमुख शिष्यों सर्वश्री सुमंतु, जैमिनी, वैशम्पायन और पैला को इस सँग्रहण को पढ़ाया. विभाजन और सँपादन के कारण उन्हें “व्यास” (व्यास = सँपादित करना, विभाजित करना) की उपाधि प्राप्त हुई. उन्होंने वेदों को चार भागों ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित भी किया था.
करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष तोमर इस पूर्णिमा को हिंदुओं के अलावा बौद्ध व जैन धर्म से भी जोड़ते हैं. वह बताते हैं कि भगवान गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के लगभग पाँच सप्ताह बाद बोधगया से सारनाथ गए थे. ज्ञान प्राप्ति से पहले ही उन्होंने अपनी कठोर तपस्या त्याग दी थी.
बौद्ध इतिहास की जानकारी देते हुए वह बताते हैं कि उनके पूर्व सहपाठी, पंचवर्गिक, उन्हें छोड़कर सारनाथ के ऋषिपतन चले गए थे. ज्ञान प्राप्ति के बाद, बुद्ध उरुविल्वा छोड़कर ऋषिपतन गए और वहाँ के शिष्यों से जुड़कर उन्हें शिक्षा देने लगे.
तोमर रौशनी डालते हुए कहते हैं कि वे (भगवान बुद्ध) उनके पास इसलिए गए क्योंकि उन्हें अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का प्रयोग करके देखना था कि उनके पाँच पूर्व सहपाठी धर्म को शीघ्र ही समझते हैं कि नहीं. सारनाथ जाते समय गौतम बुद्ध को गँगा नदी पार करनी पड़ी थी.
ऐतिहासिक जानकारी देते हुए तोमर कहते हैं कि जब राजा बिंबिसार को इस बात का पता चला, तो उन्होंने तपस्वियों से लिया जाने वाला शुल्क समाप्त कर दिया. जब गौतम बुद्ध अपने पाँच पूर्व सहपाठियों से मिले, तो उन्होंने उन्हें धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र का उपदेश दिया. जिसे वे समझ गए और उन्हें भी ज्ञान प्राप्त हुआ.
इसी दिन यानि कि आषाढ़ माह की पूर्णिमा के दिन भिक्षु सँघ की स्थापना हुई थी. इसके बाद बुद्ध ने अपनी पहली वर्षा ऋतु सारनाथ में मूलगंध कुटी में बिताई थी. भिक्षु सँघ में जल्द ही 60 सदस्य हो गए. भगवान बुद्ध ने उन्हें सभी दिशाओं में अकेले यात्रा करने और धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा दिया था.
क्षत्रिय करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष तोमर इस पर्व को जैन धर्म से भी जुडा़ बताते हैं. जैनियों की परंपराओं के अनुसार , गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरुओं और शिक्षकों को विशेष श्रद्धा अर्पित की जाती है.
आगे वह कहते हैं कि यह दिन चातुर्मास के प्रारँभ में पड़ता है. इस दिन भगवान महावीर ने कैवल्य प्राप्त करने के बाद गौतम स्वामी को अपना पहला शिष्य (गणधर) बनाया. इस प्रकार वह स्वयँ गुरु बन गए.
भाई वीरेन्द्र कहते हैं कि इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं क्योंकि यह वेदों के रचयिता महर्षि वेदव्यास का जन्मदिवस है. सनातन धर्म में वे पहले गुरु माने जाते हैं. ‘गुरु’ शब्द का अर्थ है जो अज्ञान रूपी अँधकार को मिटाकर जीवन में ज्ञान का प्रकाश लाए.
तोमर ने पुनः गुरु पूर्णिमा का उल्लेख करते हुए कहा है कि इस दिन हमारे सभी आध्यात्मिक, शैक्षणिक और जीवन को सही दिशा देने वाले गुरुओं के प्रति सम्मान और धन्यवाद प्रकट किया जाता है. योग परँपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने पहले गुरु के रूप में सप्तऋषियों को योग का ज्ञान देना शुरू किया था.
