‘सब पहले से फिक्स था…’ SC के फैसले पर भड़के योगेंद्र यादव; सुप्रीम कोर्ट को कह दिया ‘उपभोक्ता फोरम’!

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नई दिल्ली: वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आते ही देश की राजनीति गरमा गई है। इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता और वरिष्ठ सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कोर्ट के फैसले पर बेहद तीखा और सनसनीखेज हमला बोला है।

योगेंद्र यादव ने इस फैसले को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला दिन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की तुलना एक ‘उपभोक्ता फोरम’ से कर दी है।

🛑 ‘मुझे कोई उम्मीद नहीं थी, स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी’
फैसले के बाद अपने आधिकारिक बयान में योगेंद्र यादव ने न्यायपालिका पर सीधा निशाना साधते हुए कहा:

“मैं आज फैसला सुनने कोर्ट नहीं गया, क्योंकि मुझे इससे कोई उम्मीद ही नहीं थी। इस केस का फैसला तो बहुत पहले ही हो चुका था, हम तो बस कानूनी बारीकियों और इसकी फाइनल कॉपी का इंतजार कर रहे थे।”

योगेंद्र यादव की सुप्रीम कोर्ट पर 4 बड़ी आपत्तियां
‘संवैधानिक अदालत’ से ‘उपभोक्ता फोरम’ बनना: यादव का आरोप है कि पिछले साल अगस्त में ही कोर्ट का रुख साफ हो गया था। तीन दिन दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इस मामले के संवैधानिक सिद्धांतों को जांचने के बजाय सिर्फ एक शिकायत निवारण फोरम (कंज्यूमर फोरम) की तरह काम करना शुरू कर दिया।

चुनाव आयोग को मिली खुली छूट: उनका कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) को बिहार चुनाव कराने की जल्दबाजी में इजाजत दी, तभी केस का अंत तय हो गया था। आयोग ने वोटर लिस्ट की बड़ी खामियों को सुधारे बिना ही चुनाव करवा दिए।

करोड़ों नागरिकों का मताधिकार खतरे में: योगेंद्र यादव ने दावा किया कि इस फैसले से कानूनी तौर पर लाखों लोगों का वोटिंग राइट छीन लिया गया है। उन्होंने कहा, “अब तक कम से कम 5.9 करोड़ लोगों के नाम काटे जा चुके हैं और अंतिम आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंच सकता है।”

“अब BJP तय करेगी कौन वोट देगा!” यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट में लिखा कि असली खबर यह नहीं है कि कोर्ट ने SIR को सही ठहराया, बल्कि खबर यह है कि अब देश में सत्तारूढ़ दल तय करेगा कि कौन वोट दे सकता है और कौन नहीं।

⚖️ साल 2026 का ‘ADM जबलपुर केस’! क्या था वो काला इतिहास?
योगेंद्र यादव ने इस केस (ADR बनाम भारत संघ- 2026) की तुलना 1976 के कुख्यात ‘एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ मामले से कर दी। इसे भारतीय न्यायपालिका का सबसे काला अध्याय माना जाता है:

1975 की इमरजेंसी: इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल के दौरान मीसा (MISA) कानून के तहत विपक्षियों को बिना कारण बताए जेल में डाल दिया था।

कोर्ट का सरेंडर: 1976 में सुप्रीम कोर्ट के 5 में से 4 जजों ने फैसला दिया था कि इमरजेंसी में नागरिकों का ‘जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ (अनुच्छेद 21) सस्पेंड हो जाता है और सरकार किसी को मार भी दे, तो नागरिक कोर्ट नहीं जा सकते।

सिर्फ एक जज डिगे नहीं: उस समय सिर्फ जटिस एच.आर. खन्ना ने सरकार के खिलाफ जाकर नागरिकों के अधिकारों का समर्थन किया था, जिसकी कीमत उन्हें चीफ जस्टिस का पद गंवाकर चुकानी पड़ी थी।

यादव का तर्क: जैसे 1976 में सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में नाकाम रहा था, ठीक वैसे ही आज कोर्ट ने चुनाव आयोग के सामने घुटने टेक दिए हैं और करोड़ों लोगों का वोट देने का अधिकार छीनने की अनुमति दे दी है।

🛡️ सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या है?
आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में चुनाव आयोग के SIR (Special Intensive Revision) को पूरी तरह संवैधानिक और सही ठहराया है। कोर्ट का कहना है कि चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट से नाम हटाने और जोड़ने का पूरा कानूनी अधिकार है।

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