देहरादून: देश के कई हिस्सों में दस्तक देने के बाद अब मॉनसून तेजी से उत्तराखंड की तरफ बढ़ रहा है। मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, राज्य में 20 जून से 25 जून के बीच मॉनसून के पहुंचने की पूरी संभावना है। जहां एक तरफ यह बारिश कृषि, जल स्रोतों और अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित होती है, वहीं दूसरी तरफ पहाड़ी इलाकों में इसके साथ आने वाली आपदाएं बड़ी चिंता का सबब बनी हुई हैं।
संभावित खतरों को देखते हुए आपदा प्रबंधन मुस्तैद
आगामी मॉनसून सीजन के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गया है। विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी है कि हाल ही में एक अहम समीक्षा बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक के तहत राज्य के:
- भूस्खलन संभावित क्षेत्रों (Landslide Prone Areas)
- बाढ़ संभावित क्षेत्रों (Flood Prone Areas)
- नदी तटों और भू-कटाव वाले इलाकों का एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया जा रहा है।
राहत और बचाव कार्यों को समय पर पूरा करने के लिए SDRF, NDMA, पुलिस, फायर ब्रिगेड, ITBP और सेना को भी सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, मार्ग अवरुद्ध होने की स्थिति में यात्रा सुचारू रखने के लिए वैकल्पिक रास्तों की व्यवस्था की जा रही है।
विकास या विनाश? विशेषज्ञों ने जताई चिंता
उत्तराखंड के लिए मॉनसून का इतिहास काफी दर्दनाक रहा है। पिछले कुछ सालों में राज्य ने कई बड़ी त्रासदियां झेली हैं:
- 2010: रुद्रप्रयाग में भीषण भूस्खलन।
- 2013: केदारनाथ की ऐतिहासिक जलप्रलय।
- 2023 और 2024: जोशीमठ में हुआ भू-धंसाव।
- 2025: उत्तरकाशी के धराली और देहरादून में आई भीषण आपदा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन आपदाओं की एक बड़ी वजह पहाड़ों में अंधाधुंध और अनियोजित विकास है। सड़कों का चौड़ीकरण, बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जंगलों की कटाई ने पहाड़ों की ढलानों को कमजोर कर दिया है। भारी बारिश होते ही ये कमजोर श्रृंखलाएं भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) का रूप ले लेती हैं।
फिलहाल, प्रशासन का पूरा जोर इस बात पर है कि मॉनसून के आगमन से पहले सभी सुरक्षात्मक तैयारियां पूरी कर ली जाएं ताकि जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।
