Dynamics of US-Pakistan Relation: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर आ गए हैं। खुद को शांतिदूत के रूप में पेश करने और अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता करने की पाकिस्तान की कोशिशें अब उसी के लिए जी का जंजाल बनती नजर आ रही हैं।
अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के हालिया बयानों और पाकिस्तान की रणनीतिक नाकामी ने ट्रंप प्रशासन के सामने उसकी पोल खोल दी है।
🔍 विवाद की मुख्य वजह: ‘दोगली नीति’ पर उठे सवाल
शुरुआत में पाकिस्तान ने ट्रंप प्रशासन को लुभाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था। ईरान संकट के दौरान इस्लामाबाद ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मेजबानी की और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की तारीफों के पुल बांधे। लेकिन जल्द ही उसकी यह कूटनीति धरी की धरी रह गई:
ईरानी विमानों को पनाह: रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस वक्त पाकिस्तान मध्यस्थ बनने का नाटक कर रहा था, उसी दौरान ईरानी सैन्य विमानों को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर सुरक्षित छिपाया गया था।
लिंडसे ग्राहम का तीखा हमला: इस पर भड़कते हुए अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने साफ कहा:
“पाकिस्तान एक मध्यस्थ से कहीं ज्यादा एक बड़ी समस्या है। अगर ईरानी विमान पाकिस्तानी बेस पर सुरक्षित हैं, तो पाकिस्तान मध्यस्थ कैसे हो सकता है? इजरायल के प्रति उनकी दुश्मनी जगजाहिर है।”
❌ अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) पर पाकिस्तान का इनकार
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने की अपील की थी ताकि इसे ईरान डील का हिस्सा बनाया जा सके।
हालांकि, चीन के प्रभाव में आकर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे सीधे तौर पर खारिज कर दिया। उन्होंने कहा:
“व्यक्तिगत रूप से मैं किसी ऐसे समझौते का समर्थन नहीं कर सकता जो हमारी मूल विचारधारा से टकराता हो। जिन लोगों के वादों पर एक दिन का भी भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ हम कैसे बैठ सकते हैं?”
पाकिस्तान का रुख साफ है कि वह इजरायल को तब तक मान्यता नहीं देगा जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम (East Jerusalem) राजधानी के साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य नहीं बन जाता।
📉 वो 3 फैसले, जिसने ट्रंप प्रशासन को किया नाराज
आर्थिक तंगहाली से जूझ रहा पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका से वित्तीय मदद और IMF बेलआउट पैकेज की उम्मीद करता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका की किसी भी रणनीतिक मांग को मानने से कतराता है। उसने मुख्य रूप से तीन मोर्चों पर अमेरिका को निराश किया है:
गाजा स्टेबलाइजेशन फोर्स में शामिल होने से साफ इनकार।
पीठ पीछे ईरान को सैन्य और रणनीतिक सहयोग देना।
अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनने से पूरी तरह मना करना।
🇨🇳 चीन की ओर झुकाव और भारत के लिए बदलता समीकरण
अमेरिका अब पाकिस्तान को एक ‘साझेदार’ नहीं बल्कि एक ‘अवसरवादी खिलाड़ी’ के रूप में देख रहा है। यही वजह है कि पाकिस्तान अब तेजी से दोबारा चीन की गोद में जा बैठा है:
CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) को फिर से गति दी जा रही है।
सुरक्षा के नाम पर चीन अपनी सैन्य टुकड़ियां पाकिस्तान भेजने लगा है।
चीन ग्वादर पोर्ट के जरिए भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है।
🇮🇳 भारत को क्या होगा फायदा?
पाकिस्तान के इस रवैये के बाद वाशिंगटन का झुकाव एक बार फिर नई दिल्ली की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत के पक्ष में बयान दे रहे हैं, अमेरिकी विदेश मंत्री ने हाल ही में भारत में तीन दिन बिताए हैं और अमेरिकी प्रशासन लगातार भारत के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करने में जुटा है।
निष्कर्ष: पाकिस्तान ने अमेरिका को रिझाने के चक्कर में जो जाल बुना था, आज वह खुद उसमें उलझ चुका है। कंगाली के दौर में अमेरिका की नाराजगी और चीन पर अत्यधिक निर्भरता पाकिस्तान को एक बेहद खतरनाक मोड़ पर ले आई है।
